Loading... काव्यांजलि तेज (Kavyanjali Tej) Jagram Singh 1111016936207
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Jagram Singh

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पुस्तक के बारे में

धीरे- धीरे शब्द जब तारुण्य वय को प्राप्त होते हैं तो उनमें निराशा में आशा, संघर्ष में परिणाम, परिश्रम में उत्साह, लक्ष्य में समर्पण, दुर्गमता में सुगमता, असहजता में सहजता, प्रतिकूलता में अनुकूलता आदि देव दुर्लभ सद्गुण सहज ही लौह कवचयुक्त उदात्त भाव जीवन में प्रवेश करते हैं और पथ पर चलने वाले हर पथिक का स्वयं मूक पाषाण बनकर संकटों में भी मुस्कराते हुए दिशादर्शन कराते हैं और उसे या उससे जले दीपों में नवोत्साह का प्रखर नवोन्मेष भरतें हैं। ऐसा तेज रूपी प्रखर दिवाकर सम्पूर्ण अंधकार को निस्तेज कर तेज को फैलाता है। काव्यांजलि तेज इसी प्रखर दिनकर सा प्रवाह रूप धारण कर कतर्व्य पथ पर निरन्तर गतिमान होने की, सदागतिमान रहने की भी निश्छल प्रेरणा देता है और निराशा के गर्त में आकण्ठ डूबे बांधवों की स्वयं पतवार पकड़कर भंवर से पार कराता है यही इसकी भावांजलि हैं।

लेखक का परिचय

जीवन परिचय
नामः जगराम सिंह
माता का नामः स्व. श्रीमती गोमती देवी
पिता का नामः स्व. श्री इन्दल सिंह
शिक्षाः स्नातकोत्तर - अंग्रेजी
अध्यापनः 1989 से 1994 तक हायर सेकेण्डरी स्कूल में अंग्रेजी विषय का अध्यापन
कार्यक्षेत्राः 1994 से अब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक
साहित्य सेवाः
मूल अभिरूचिः अंग्रेजी भाषा में पद्य लेखन (सौ से ऊपर काव्य संग्रहद्ध)
अंग्रेजी व्याकरण में: (1) New Flow of Spoken English
(2) New Flow of General English
हिन्दी भाषा में पद्य साहित्यः

(1) काव्यांज्जलि-भोर (2) काव्यांज्जलि-उदय (3) काव्यांज्जलि-किरण (4) काव्यांज्जलि-प्रभात

हिन्दी भाषा में गद्य साहित्यः
(1) भारत दर्शन (2) माँ (3) सामाजिक क्रांति के शिल्पी (4) समरसता के भगीरथ
(5) उत्सव हमारे प्राण (6) राष्ट्र के गौरव (7) हमारी प्रार्थना

विषय-सूची

1. अपने तो अपने ही होते 1
2. सबके बिनान उन्नति संभव 2
3. सबके स्वाभिमान की सुरक्षा 3
4. कोई भी न अपमानित हो 4
5. मुरझाये उपवन 5
6. निराशा के घर 6
7. बिना सभी को संग ले 7
8. जो बढ़ा पर्वतों को लांघकर 8
9. चलने वाले को 9
10.अविराम साधना के सन्मुख 10
11.पूर्व सब को मीत बनाओ 11
12.ममता की शीतल छांव 12
13.उन सबके आंसू पोंछो 13
14.गंगा सबके 14
15.जो कुछ मिला अतीत से 15
16.कर्म पंथ पर चलते - चलते 16
17.हृदयों के संताप हरें 17
18.कभी ग्रहण न लगने देना 18
19.आत्मसंयम से 19
20.परस्पर पतवार बनें 20
21.पुरखों का सम्मान करें 21
22.भेदभाव को पूर्ण मिटाकर 22
23.बचन पालन सच्ची पूजा 23
24.गुणों की पूजा से 24
25.नेह के बेर के आगे 25
26.दुर्गुणों की पूजा ही 26
27.ज्ञान कभी न घृणा योग्य है 27
28.प्रेम में तो शूल भी 28
29.नेह के अभाव में 29
30.ममत्व का अपमान संजीवनी बनेगा 30
31.उपकार में जीवन समर्पित 31
32.सुमनों से उपवन की शोभा 32
33.परिजनों के सुख दुख में 33
34.दुखियों के घाव 34
35.काम आना और के 35
36.वेदना सृजन का कारण 36
37.योजना ही कार्य का 37
38.सामर्थ्य के अनुसार 38
39.ध्येय के लिए 39
40.जब सब मिलकर एक... 40
41.अब तो जय उसकी बोलेंगे... 41
42.संगठित शक्ति, जब सूर्य... 42
43.संगठन ही सफलता... 43
44.संगठन अस्तित्व आधार होता है... 44
45.स्नेह सुधार की फुहार से.... 45
46.जल उठा यदि दीप तो... 46
47.कोई सोता नहीं रहा... 47
48.प्रयास भी निष्फल हुए... 48
49.टूटे हुए हृदयों को... 49
50.यदि चाहो तो... 50
51.निष्काम प्रवाह सन्निहित... 51
52.समान योगदान हो... 52
53.उद्यम के आगे... 53
54.सत्य की विजय... 54
55.निर्माण ही आदि... 55
56.अपने लिए सबको न झोंको... 56
57.धर्म पथ पर चलने वाला... 57
58.रेत के ढेर पर कौन... 58
59.अपनों के सुख छीन... 59
60.हठ होती बिनास का घर... 60
61.भय से कब तक बांध सकोगे... 61
62.एक दिन सोने का महल... 62
63.अपने हाथ से क्यों... 63
64.जो जलाये दीप... 64
65.कपट भी दिवस हो गया... 65
66.दीपक वहीं जलाये जाते... 66
67.राजा यदि प्रजा पालक होतो... 67
68.राजा हो छत्र गगन सा... 68
69.एक के अपराध का... 69.
70.अपराध स्वयं अक्षम्य होता है... 70
71.कार्य हुआ पूर्ण अब... 72
72.महाप्रलय में भी सत्य... 73
73.जिसका था उसी का अधिकार अंतिम... 75
74.जीवनभर सबका ऋणी रहूँगा... 77
75.शूल से चुभते यहां के पल सभी... 78
76.सबके सहयोग से ही विजय पाई... 79
77.अब कैसे दिन कटेंगे... 80
78.जो जलाया दीपक... 81
79.प्रेम की गंगा में ही बहती रहे... 82
80.जब तक संगठित रहेंगे... 83
81.बचन दो ऐसे ही रहेंगे... 84
82.यदि रोयेंगे, तो न जा सकूँगा... 85
83.जो जन्मा है उसे तो... 86
84.विजय भी बांध न सकी... 88
85.चल दिये ऐसे जैसे... 89
86.एक पल का विलंब... 90
87. प्रतीक्षा में बैठा? 91
88. विजय आनंद... 92
89. नियति ने जो दिया... 93
90. जीवन के अंतिम क्षण तक... 94
91. जीवन आँसू में बीत गया... 95
92. स्वजन के अभाव... 97
93. प्रभु चरणों से कभी... 98
94. ठुकराई जाकर भी... 99
95. कब तक परीक्षा देती रहूँगी... 100
96. जो दिया वरदान... 101
97. फिर और न ऐसी... 102
98. अब करना क्षमा... 103
99. सेवा की चाहत... 104
100. स्वजनों के अभाव में... 105
101. भोर के बिना सुमन... 106
102. कर्तव्य भी अभिशाप बन गया... 107
103. जीवन भर शूलों पर सुलाया... 108
104. जिसने मुझे सब कुछ दिया... 109
105. कर्तव्य भी कितना अभागा होता है... 110
106. क्षमा कर देना प्रिये... 111
107. क्या करूं विवस था... 112
108. संकल्प! अब न कभी कांटा बनूंगा... 113
109. व्यवस्थायें हृदय में... 114
110. श्वांस के बिना जीना... 115
111. कर्तव्यकीशिलाने... 116
112. पश्चाताप ही शेष अंतर... 117
113. अब कर्तव्य को बंधनों के... 118
114. नीड़ तक भी... 119
115. सिर पर ढेर सारा... 120
116. सभी के सपनों को साकार कर सका न... 121
117. अगले जन्म में सब ऋण चुकाउँगा... 122
118. सब कुछ हंस हंस कर सहता रहा... 123
119. जो था वह सब भेंट किया... 124
120. चलो प्रयाण का... 125
121. चल दिए सब को छोड़ कर धार में... 126
122. अवसान का प्रहर... 127
123. एक पल भी अब यहाँ... 128
129. जो मर्यादाओं से... 129


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Last updated: 18-Jul-2019   Designed by IndiaPRIDE.com